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वर्तमान समय में शिक्षा मनोविज्ञान का महत्त्व IMPORTANCE OF EDUCATION PSYCHOLOGY IN PRESENT TIME

 वर्तमान समय में शिक्षा मनोविज्ञान का महत्त्व (Importance of Education Psychology in present time)


शिक्षा मनोविज्ञान को वर्तमान समय में उचित महत्त्व प्रदान किया गया है। कुछ नये अन्वेषणों के कारण अब स्थिति एकदम बदल गई है। अध्यापकों के सामने भी अब नई-नई विधियों आने लगी है. फलत: उनके शुष्क कार्यों में सजीवता आ गई है। अब सारा कार्य वैज्ञानिक होता जा रहा है। अध्यापको के कर्त्तव्य अब पहले से बदलते जा रहे है। अब उसे अपने बालको के वैयक्तिक और सामाजिक आदि वातावरण से परिचित होना है। अध्यापक को अब यह जानना है कि बालक किस कुटुम्ब से आये हैं. उनका वातावरण कैसा है, वैयक्तिक विभिन्नता के आधार पर कोई तीव्र है तो कोई मन्द तो कोई कुशाग्र बुद्धि ।


जब तक सांख्यिकी व मनोविज्ञान की कसौटी पर बालकों की योग्यताओं और सम्भावनाओं की परीक्षा नहीं हो जाती तब तक उसके विषय में कुछ निश्चित निर्णय देना शिक्षा के न्यायालय में अक्षम्य अपराध माना जाता है। अब लोग एक स्वर से यह मानने लगे हैं कि मानव परिवर्तनशील है। अतः बालक विषयक सारी बातें निर्णयात्मक न होकर सांकेतिक होनी चाहिए. बालक सम्बन्धी सभी बुराइयों के कारणों को समझने की अध्यापक में पूर्ण योग्यता होनी चाहिए। इन्हें दूर करने के उपायों की भी जानकारी होनी चाहिए। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि अध्यापक को शरीर विद्या. समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान का कुछ न कुछ ज्ञान होना आवश्यक है। मनोविज्ञान की शिक्षा के बिना शिक्षा के मूल्यों व आकांक्षाओं की पूर्ति असम्भव है। शिक्षा मनोविज्ञान वर्तमान में अध्यापक के जीवन को ज्ञान से सम्बन्धित कर उसकी शिक्षण प्रणाली को उन्नत बनाकर उसे मूल्यों की प्राप्ति में सहायता पहुँचाती है।


शिक्षक के लिये बाल मनोविज्ञान की उपयोगिता (UTILITY OF CHILD-PSYCHOLOGY FOR TEACHER)


शिक्षक के लिये बाल मनोविज्ञान का ज्ञान बहुत आवश्यक है। यदि शिक्षक अपने इस ज्ञान का विद्यार्थी के जीवन में प्रयोग करे, तो बालकों में महत्त्वपूर्ण अपेक्षित परिवर्तन कर सकता है। बाल मनोविज्ञान के ज्ञान से शिक्षक को बालक के विकास की प्रक्रिया एवं विकास के सिद्धान्त का ज्ञान होगा। इस ज्ञान का पूरा उपयोग वह बालकों को सही दिशा देने में कर सकता है।


बाल मनोविज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि बालक की प्रारम्भिक आयु सीखने की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। यही कारण है कि उच्च कक्षाओं की तुलना में छोटी कक्षाओं का अध्ययन, विकास की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। बाल मनोविज्ञान के ज्ञान से ही शिक्षक विद्यालय का वातावरण स्वास्थ्यप्रद बनायेगा क्योंकि शिक्षक को स्वास्थ्य के बारे में अच्छा ज्ञान होगा। विद्यालय केवल पढ़ने का स्थान ही नहीं है बल्कि वहाँ बालकों का सर्वागीण विकास भी किया जाता है। इसके साथ ही बालकों को आत्माभिव्यक्ति, आत्मानुभूति के पूरे अक्सर देना भी विद्यालय के शिक्षकों का ही काम है। शिक्षक विद्यालय का वातावरण बालकों की शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक एवं अन्य आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार करेंगे। अध्यापक को ऐसा कोई दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए जिससे बालक के मन में हीन ग्रन्थियों उत्पन्न हो। बालक के मन की ग्रन्थियों से उनके व्यक्तित्व में असमायोजन हो जाता है।


बाल मनोविज्ञान के ज्ञान से ही शिक्षक किशोरों की समायोजन की समस्या दूर कर सकेंगे। किशोरावस्था में बालक-बालिकाओं की अनेक समस्यायें होती है. लेकिन बाल मनोविज्ञान का ज्ञान उनको सही दिशा दे सकता है। यदि इस समय उनको सही दिशा नहीं दी गई, तो वे अपराधी एवं गन्दी आदतों से ग्रस्त बालक या अपराधी बालक बन जायेंगे।


बाल मनोविज्ञान के ज्ञान के कारण शिक्षक विद्यालय को पूरी तरह बाल-केन्द्रित बना सकता है। इसमें बालक की रुचि योगदान, क्षमता अभिवृत्ति आदि को ध्यान में रखकर शिक्षा की व्यवस्था करेगा। अच्छे अध्यापक के लिये बालकों का स्वभाव एवं उनके मनोविज्ञान का ज्ञान उसी तरह जरूरी है जिस तरह अच्छे स्वास्थ्य के लिये औषधि एवं यंत्रों के साथ रोगी के स्वभाव का ज्ञान जरूरी है। विद्यालय में चलने वाली विभिन्न पाठ्य सहगामी क्रियाओं में भी वह परिवर्तन कर सकेगा। पाठ्य सहगामी क्रियायें भी बालकों के लिये उतनी ही आवश्यक है, जितनी अध्ययन की प्रक्रियायें। पाठ्य सहगामी क्रियाओं के माध्यम से वह सही अनुशासन रख सकेगा। विद्यालय का वातावरण स्वस्थ बना सकेगा। ऐसे अनेक उदाहरण हमें देखने को मिलते हैं, जिनमें मनोविज्ञान के ज्ञान से अध्यापकों ने बालकों के जीवन में काफी परिवर्तन कर दिया। आज शारीरिक दण्ड या भय से बालक में सुधार नहीं किया जा सकता है। बालकों को प्रेम, सहानुभूति, प्रशंसा, सही निर्देशन एवं सलाह देकर अच्छा बनाने में मदद की जा सकती है। दिन-प्रतिदिन एवं विद्यालय में आने वाली समस्याओं के समाधान में बाल मनोविज्ञान निश्चित रूप से उपयोगी होता है।


शिक्षा मनोविज्ञान की सीमाएँ (LIMITATIONS OF EDUCATIONAL PSYCHOLOGY)


एक शिक्षक शिक्षा मनोविज्ञान का ज्ञान केवल पुस्तकों से प्राप्त करके एक व्यवहारकुशल मनोवैज्ञानिक अथवा योग्य अध्यापक नहीं बन सकता है। योग्य अध्यापक बनने के लिये उसकी रुचि, मनोवृत्ति, अभ्यास एवं अनुभव की आवश्यकता होती है। शिक्षा मनोविज्ञान तो केवल उसे सूचना एवं ज्ञान प्रदान करेगा, उसकी योग्यता में वृद्धि उसके अपने अनुभव इत्यादि पर निर्भर होगी। अतएव शिक्षा मनोविज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण सीमा यह है कि शिक्षा की प्रकृति ऐसी है कि उसमें ज्ञान, सूचना व तथ्यों के संकलन के अतिरिक्त भी अन्य बातों की आवश्यकता है।


शिक्षा मनोविज्ञान की दूसरी सीमा इसके वैज्ञानिक रूप के कारण है। विज्ञान से तथ्य तो प्रकाश में आते हैं, किन्तु उसके द्वारा अन्तिम निर्णय नहीं लिये जा सकते हैं। जैसे-विज्ञान द्वारा अणु-शक्तिकेकेकेउत्पादन इत्यादि का ज्ञानकेतो प्राप्त होकेजाता है, किन्तु इस शक्ति का प्रयोग कैसे हो. इसका निर्णय विज्ञान से न मिलकर सामाजिक शास्त्रों एवं मानव कल्याण से सम्बन्धित विधियों द्वारा प्राप्त होता है। शिक्षा मनोविज्ञान से भी हमें केवल तथ्यों का पता चलता है। उनके प्रयोग के निर्णय के सम्बन्ध में कुछ अन्य बातों का पता चलना भी नितान्त आवश्यक है।

शिक्षा मनोविज्ञान हमें यह तो बता सकता है कि किस प्रकार का वातावरण किस प्रकार की शिक्षा के लिये उत्तम है। किन्तु वर्तमान स्थिति में वह वातावरण कैसे उत्पन्न किया जा सकता है।

अथवा उसका निर्माण करना कितना सम्भव है, इसका निर्णय मनोविज्ञान के क्षेत्र में बाहर ही समझा जा सकता है।

हम कह सकते हैं कि किसी समस्या को सुलझाने में विज्ञान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है और विज्ञान द्वारा संकलित किये गये तथ्य अनेक दशाओं में समस्या समाधान में मूल होते हैं. फिर भी सम्पूर्ण तथ्य मिलकर भी समस्या के सम्बन्ध में निर्णय लेने की आवश्यकता को समाप्त नहीं कर सकते।

शिक्षा मनोविज्ञान की दूसरी सीमा इसके वैज्ञानिक रूप के कारण है। विज्ञान से तथ्य तो प्रकाश में आते हैं, किन्तु उसके द्वारा अन्तिम निर्णय नहीं लिये जा सकते हैं। जैसे-विज्ञान द्वारा अणु-शक्तिकेकेकेउत्पादन इत्यादि का ज्ञानकेतो प्राप्त होकेजाता है, किन्तु इस शक्ति का प्रयोग कैसे हो. इसका निर्णय विज्ञान से न मिलकर सामाजिक शास्त्रों एवं मानव कल्याण से सम्बन्धित विधियों द्वारा प्राप्त होता है। शिक्षा मनोविज्ञान से भी हमें केवल तथ्यों का पता चलता है। उनके प्रयोग के निर्णय के सम्बन्ध में कुछ अन्य बातों का पता चलना भी नितान्त आवश्यक है।


भौतिक विज्ञान या रसायनशास्त्र अथवा अन्य प्रकृति विज्ञान तथ्यों के झुण्ड के झुण्ड को नियमों, सिद्धान्तों या सामान्यीकरण के रूप में रख देते हैं। एक वैज्ञानिक को इन नियमों इत्यादि। को ही स्मरण रखना होता है और वह इस विज्ञान सम्बन्धी जटिल से जटिल समस्या को सुलझा लेता है, किन्तु एक मनोवैज्ञानिक को तथ्यों के झुण्डों में से अपनी समस्या सम्बन्धी तथ्यों को निकालना होगा। इन तथ्यों का प्रयोग समस्या हल में जैसे उसे प्राप्त हुये है, वैसे ही नहीं, वरन इनमें स्थान एवं समय या वातावरण के अनुसार परिवर्तन लाकर करना होगा। कुछ एक उदाहरण से उपर्युक्त बात स्पष्ट हो जायेगी। एक इंजीनियर को एक भवन का निर्माण करना है। वह भवन निर्माण सम्बन्धी नियमों का अध्ययन कर भवन की इमारत खड़ी कर देगा। नीव की गहराई, चूने, सीमेण्ट की मिलावट इत्यादि सभी जो भवन को मजबूती प्रदान करते हैं। इसका उसे ज्ञान होगा और वह नियमानुसार भवन बनवा देगा। किन्तु एक अध्यापक, जिसे चरित्र-निर्माण कराना है, किसी भी ऐसे नियमों पर अपना कार्यक्रम आधारित नहीं कर सकता. जो चरित्र-निर्माण सम्बन्धी पूर्णरूप से निर्धारित हो। चरित्र-निर्माण के लिये उसे वंशानुक्रम, वातावरण, आदतों इत्यादि सम्बन्धी अध्ययनों का अवलोकन करना होगा, फिर देखना होगा कि किस प्रकार चरित्र-निर्माण का कार्यक्रम प्रारम्भ किया जा सकता है।

अतः हम कह सकते हैं कि शिक्षा मनोविज्ञान की तीन महत्त्वपूर्ण सीमाएँ है- 

(i) शिक्षा मनोविज्ञान का प्रयोग शिक्षण की प्रकृति के अनुसार अनुभव, रुचि, मनोवृत्ति इत्यादि एक शिक्षक के लिये उतने ही आवश्यक है, जितना कि मनोविज्ञान का ज्ञान।

(ii) शिक्षा मनोविज्ञान की इस सीमा में सीमित है कि तथ्यों की सत्यता की जाँच की जाये अथवा नये तथ्यों का पता लगाया जाये। निर्णय करने में केवल सहायक होते हैं. न कि निर्णय को अन्तिम रूप से निर्धारित करने में। 

(iii) शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की सीमा में ही सीमित है।

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