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6 पाठ योजना का प्रारूप

 पाठ योजना का प्रारूप




पाठ-योजना के विभिन्न पदों का विश्लेषण : तिथि - यहाँ वह तिथि लिखी जाती है, जिस दिन पाठ को पढ़ाना होता है ।

समय - वह अवधि जितनी देर तक कालांश (Period) चलता है। कालांश– विद्यालय समय तालिका के अनुसार वह घंटी जिसमें वह पाठ पढ़ाया जाएगा।


कक्षा – जिस वर्ग को शिक्षक पढ़ाएगा, वह विभाग सहित लिखना होता है । विषय- पढ़ाये जानेवाले विषय का नाम,


यथा - गणित, विज्ञान, भाषा ।


प्रकरण – अध्यापक जिस पाठ को पढ़ाना चाहता है उसका शीर्षक, यथा-सरल ब्याज, आयत का क्षेत्रफल, शंकु का आयतन, आदि का उल्लेख गणित विषय में करना पड़ता है।


सामान्य उद्देश्य — इसके अन्तर्गत वे उद्देश्य होते हैं, जिन्हें हम किसी पाठ विशेष के पढ़ाने पर प्राप्त करना चाहते हैं । वे सामान्य उद्देश्य से अलग होते हैं । साथ ही प्रत्येक पाठ के लिए भी अलग-अलग होते हैं। इसे पढ़कर ज्ञात हो जाता है कि छात्र पूरे कालांश में क्या-क्या करेंगे ।


सहायक सामग्री – इस पाठ में यह लिखा जाता है कि अध्यापक को अपने पाठ पढ़ाने में कक्षा को दैनिक आवश्यक सामग्री के अतिरिक्त और कौन-कौन-सी सामग्री की आवश्यकता है जिसका प्रयोग वह कक्षा में करेगा ।


पूर्व-ज्ञान- शिक्षक आज जो पाठ पढ़ाना चाहता है उससे संबंधित कितनी बातों की पूर्व जानकारी छात्रों को है ।


प्रस्तावना – शिक्षक को पाठ पढ़ाने के पहले यह जानना चाहिए कि छात्रों के पास पढ़ने के लिए आवश्यक सामग्रियाँ हैं कि नहीं ? जैसे पाठ्यपुस्तक तथा अन्य शैक्षणिक सामग्रियाँ आदि । अन्यथा ये पाठ के विकास में बाधक होते हैं । वास्तव में प्रस्तावना द्वारा छात्रों को पाठ की ओर आकर्षित करना एवं पाठ के प्रति उत्प्रेरणा उत्पन्न करना है। यहाँ प्रश्नों द्वारा पूर्व ज्ञान की जाँच व नये पाठ से संबंध जोड़ा जाता है प्रस्तावना लम्बी नहीं होनी चाहिए । 3 या 4 मिनट का समय पर्याप्त है ।


उद्देश्य - कथन – प्रास्तावना के ठीक बाद उद्देश्य - कथन किया जाता है। इससे छात्रों को यह स्पष्ट किया जाता है कि आज हम क्या पढ़ाने जा रहे हैं एवं इसकी क्या उपयोगिता है, अर्थात् आज के पाठ का उद्देश्य क्या है ?


प्रस्तुतीकरण - यहाँ से नए प्रकरण का वास्तविक पाठन प्रारंभ होता है। इसके लिए पूरे पृष्ठ को भी दो भागों में विभाजित कर देते हैं। बायीं तरफ पाठ्यवस्तु को लिखते हैं एवं दायीं तरफ पढ़ाने की विधि |


सामान्यीकरण – सामान्यीकरण से तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसमें अध्यापक प्रस्तुतीकरण में पढ़ाए गए तथ्यों के आधार पर विद्यार्थियों से ही प्रश्न पूछकर निष्कर्ष और सिद्धान्त निकलवाता है और इस प्रकार विशिष्ट से सामान्य की ओर चलने के नियम से एक सामान्य सूत्र की स्थापना करता है ।


कक्षा - कार्य – कक्षा - कार्य में श्यामपट कार्य तथा छात्रों द्वारा किया गया कार्य सम्मिलित है। शिक्षक श्यामपट पर लिखकर पाठ स्पष्ट करता है और छात्र उसे नोट करते जाते हैं। इसके पश्चात् शिक्षक अभ्यास हेतु कक्षा को कार्य देता है, जिसे छात्र अपनी कॉपी में करते हैं, जो कक्षा-कार्य कहलाते हैं। शिक्षक घूम-घूम कर इसकी जाँच करता है एवं आवश्यकता पड़ने पर व्यक्तिगत सहायता भी देता है । पुनरावृत्ति - पाठ समाप्त होने पर बालकों से


ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं जिनसे यह ज्ञात हो जाता है कि कक्षा ने पाठ को कितना ग्रहण कर लिया है । गृहकार्य – पाठ की समाप्ति के बाद छात्रों को पढ़ाई गई विषय-सामग्री से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं । इसमें कठिन प्रश्न दिये जा सकते हैं। वे प्रश्न पुस्तक से भी हो सकते हैं तथा अध्यापक निर्मित भी । संतुलित गृह कार्य को ध्यान में रखते हुए बालकों को यदि वस्तुनिष्ठ प्रश्न दिए जाएँ तो उनके समय की भी बचत हो सकती है तथा कम समय में अधिक विषय की जाँच भी की जा सकती है।


वार्षिक पाठ-योजना


वार्षिक योजना का सामान्य अर्थ हुआ कि वर्ष भर के लिए तैयार की गई योजना को वार्षिक योजना कहते हैं


योजना का एक वृहत् स्वरूप संस्थागत योजना है। प्रत्येक विद्यालय अपनी आवश्यकता एवं समस्याओं के समाधान हेतु संस्था की योजना बनाती है । संस्था की योजना में प्रधानाध्यापक, छात्र, शिक्षक, माता-पिता एवं स्थानीय समुदाय का सहयोग रहता है यह योजना संस्था के विकास की होती है, इसकी अवधि 2-3 वर्षों की होती है।


यदि हम वार्षिक योजना भाषा विषय की बनाते हैं, उनमें साल का समय अवकाश का दिन तथा रविवार छोड़कर काम का दिन निर्धारित करते हैं। वार्षिक योजना से शिक्षक को योजनाबद्ध ढंग से कार्य करने में सुविधा होती है।


द्वारिका सिंह का कथन है, योजना प्रगति और मूल्यांकन के पीछे शैक्षिक और मनोवैज्ञानिक तत्त्व है । किसी भी काम के चार पहलू होते हैं- 1. काम के लिए योजना, 2. योजना के अनुसार कार्यान्वयन, 3. कार्यान्वयन का लेखा रखना तथा 4. अंकित प्रगति का मूल्यांकन करना ।


• वार्षिक योजना चाहे विद्यालय के लिए बने या शिक्षक की वार्षिक योजना हो उनमें उपर्युक्त चारों बातों का समावेश होना चाहिए । वार्षिक योजना में हम कार्य दिन के हिसाब से महीने में उसका बँटवारा कर वर्ष के कार्यों की लेखा-जोखा की व्यवस्था करते हैं।


भाषा की वार्षिक पाठ-योजना बनाते समय पाठ्यक्रम को सामने रखना होगा और उसे मासिक, साप्ताहिक एवं दैनिक इकाइयों में बाँटना होगा । भाषा की विद्या के अनुसार वार्षिक योजना बनानी होगी । कविता, गद्य, व्याकरण, रचना, श्रुतलेख की पढ़ाई कब होगी, कैसी होगी, कौन संसाधन, उपकरण का उपयोग होगा आदि का विभाजन वार्षिक योजना में करना होगा ।


प्रधानाध्यापक के सामने स्कूल की वार्षिक योजना है। विषय- शिक्षक के समक्ष विषय की वार्षिक योजना सामने रहनी चाहिए। वार्षिक योजना में निम्न बातों पर भी गौर करना आवश्यक है- 

• वार्षिक योजना छात्र की आवश्यकता पर


आधारित हो ।


अध्ययन के लिए कौन-सी सामग्री चाहिए ?


अध्यापन के लिए कौन-सी सामग्री चाहिए ? ● कार्यों का बँटवारा। शिक्षाक्रम के अनुसार लाभ प्राप्ति के लिए


वार्षिक योजना ।


वार्षिक योजना के द्वारा विद्यालय प्रधान अपने विद्यालय में पाठगामी-सह-पाठगामी क्रियाकलापों की योजना बनाते हैं । वार्षिक योजना से यह बात स्पष्ट होती है कि साल में किस विषय में कितनी घंटियाँ होंगी। समय विभाजन कुल कार्य को देखकर अनुमान लगाकर किया जाता है। शिक्षण के लिए भी वार्षिक योजना का यही मानदंड है। शिक्षण अध्ययन की पुस्तकों की सूची योजना में रखेंगे। शिक्षणेपकरण के प्रबन्ध का जिक्र रहेगा। मासिक, अर्द्धवार्षिक, वार्षिक परीक्षा के द्वारा प्रगति का मूल्यांकन होगा। मूल्यांकन में सतत व्यापक मूल्यांकन को ध्यान में रखा जाएगा। विद्यालय वार्षिक योजना से लक्ष्य प्राप्ति की दिशा का बोध होगा। इस प्रकार योजना, प्रगति और मूल्यांकन तीनों एक तार से जुड़े हैं। वस्तुतः वार्षिक से योजना विद्यालय, प्रधानाध्यापक तथा शिक्षक की लक्ष्य प्राप्ति के लिए किए जाने वाले कार्य की रूपरेखा को स्पष्ट करती है ।


इस प्रकार हम देखते हैं कि योजनाबद्ध कार्य करने से लाभ है और वार्षिक योजना वर्ष भर की शैक्षिक रणनीति का निर्धारण है। विद्यालय के शिक्षक की शैक्षिक रणनीति का खुलासा वार्षिक योजना, पाठ-योजना से होता है।


मासिक पाठ-योजना


शिक्षण में कुशलता लाने के लिए पाठ-योजना में का अपना विशेष महत्त्व है । समयबद्ध शिक्षण अधिगम की दृष्टि से पाठ योजना एक आवश्यक व्यापार है। इसकी क्रियान्विति से शिक्षक की सफलता में चार चाँद लगता है।


यहाँ मासिक पाठ-योजना में स्पष्टतः तीन मोड़ हैं। योजना किसकी है उत्तर होगा पाठ की। इसकी अवधि मास में बँटी होगी। वार्षिक पाठ-योजना को हम महीने के हिसाब से बँटवारा करते हैं। डॉ. लक्ष्मीनारायण शर्मा का कथन है कि किसी अवधि विशेष में पढ़ाई जानेवाली सामग्री अथवा किया या करवाया जानेवाला कार्य पाठ कहलाता है । पाठ की सामग्री सैद्धान्तिक तथा प्रायोगिक दोनों प्रकार की या तो एक प्रकार की हो सकती है और पाठ में किया जानेवाला कार्य, शारीरिक, मौखिक तथा लिखित में से किसी भी प्रकार का हो सकता है। पाठ का आकार कक्षा-स्तर - शिक्षण विधि तथा अन्तर विधि से प्रभावित होता है । किसी कार्य को पूरा करने के लिए मार्गदर्शक रूपरेखा तैयार करना नियोजन कहलाता है


हम इस महीने में क्या पढ़ायेंगे, अगले महीने में क्या पढ़ायेंगे, इस महीने पर आधारित कर कार्य योजना बनाते हैं। इसलिए इसे मासिक योजना के नाम से विहित करते हैं। मासिक योजना की रूपरेखा हम निम्न प्रकार बना सकते हैं:

-माह


- पाठ्य-सामग्री अधिगम वस्तु 'शीर्षक '


- विधा अध्यापन विधि


- पाठ सम्पादन की तिथि - पाठ संशोधन


- सह - पाठगामी क्रियाशीलन - शिक्षणोपकरण


- अध्ययन सामग्री


- मूल्यांकन


– निर्देशन उपरोक्त बातों की संक्षिप्त रूपरेखा हम निम्न


रूप से कर सकते हैं :


माह के नाम


1


अध्यापन वस्तु के नाम, शीर्षक


विधा


2


3


4


अध्यापन विधि शिक्षण


5


6


अध्ययन निर्देश अध्ययन सामग्री


संशोधन तिथि


7 8


मूल्यांकन


9


10


निर्देश


मासिक पाठ-योजना पूर्णतः मूलक है । इसमें आधारभूत पाठ्यपुस्तक की पाठ वस्तु को प्रभावी बनाने एवं भाषा कौशलों के विकास की योजना रहती है । भाषा में ग्रहण तथा अभिव्यक्ति पक्ष के क्रियाकलापों का अंकन मासिक पाठ-योजना में रहना अनिवार्य है ।


यह स्पष्ट है कि मासिक योजना के माध्यम से शिक्षार्थी को अधिक उपलब्धि हो। इस दिशा की कार्य


योजना है।


पाठ को रूचिकर बनाना


पाठ को रोचक बनाने के लिए निम्नांकित समाधान अथवा तरीके काम में लाना चाहिए 1. प्राय: ऐसा देखा जाता है कि बालक बालिकाएँ बहुत देर तक किसी पाठ में अपना ध्यान नहीं लगा पाते हैं, जिसके कारण उस पाठ में उनकी रुचि कम हो जाता है । इसलिए समयानुसार विषयों में परिवर्तन होते रहना चाहिए ।


2. कक्षा - शिक्षण कार्य • एक निश्चित योजना होनी चाहिए और शिक्षक को उसी योजनाबद्ध तरीके से पाठ प्रदान करना चाहिए । 3. कक्षा में शान्त तथा वहाँ शैक्षिक माहौल


रहना चाहिए ।


4. बालकों को किसी पाठ को पढ़ाने के पहले उसके उद्देश्य अथवा प्रयोजन के बारे में वर्णन कर देना चाहिए । इसके पाठ में निरंतर उनकी रुचि बनी रहती है ।


5. कठिन तथा नीरस कारणों के सरल ढंग से छात्र-छात्राओं के सामने रखना चाहिए। उसकी प्रतिपादन शैली सरल, बोधगम्य तथा मनोरंजक हो । 6. छात्र-छात्राओं के साथ शिक्षक का व्यवहार स्नेह तथा सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए ।


7. बालकों को जो भी ज्ञान दिए जाएँ, उनके संबंध उनके पूर्व ज्ञान से करना चाहिए । पूर्व ज्ञान के आधार पर ही नवीन ज्ञान जुड़ सकता है। 8. इस बात का प्रयास किया जाय कि छात्रों के समक्ष वे ही प्रेरक प्रसंग उपस्थित किए जाएँ जो उनकी अभिरुचि के लायक हो । अर्थात् इस बात का प्रयास किया जाय कि विषय-वस्तु का संबंध उन बातों से रखा जाय जिनमें छात्र-छात्राओं की रुचि हो ।


9. बालक पढ़ते-पढ़ते थक जाते हैं और उनका अवधान पाठ की ओर नहीं रहता है। अतः अवकाश तथा विश्राम की पूरी पूरी व्यवस्था रहनी चाहिए। इस दशा में मनोरंजक कार्य और पौष्टिक भोजन बहुत आवश्यक है।


10. विविधता तथा पाठ का परिवर्तन रुचि को बनाए रखने के अच्छे तरीके हैं। अत: कठिन पाठ प्रदान करते समय आवश्यकतानुसार दूसरे प्रसंग का आयोजन कर रुचि को विकसित करना चाहिए। 11. बालक की अवस्था, योग्यता, ग्राह्यक्षमता के अनुसार सरल शिक्षण विधियों का उपयोग करना चाहिए ।


12. बालक का अवधान अधिक देर तक किसी पाठ में रखने के लिए मन्द तथा कुशाग्र बुद्धि के बालकों के लिए अलग-अलग शिक्षण-व्यवस्था होनी चाहिए । इससे पाठ में उनकी रुचि बनी रहेगी।


13. अगर शिक्षक के समय श्रव्य-दृश्य साधनों का यथोचित व्यवहार किया जाय तो पाठ में बालकों का अवधान अधिक देर तक बना रहेगा तथा उस पाठ में वे स्वेच्छापूर्वक रुचि लेते रहेंगे ।


14. यदि पाठ का संबंध किसी-न-किसी क्रिया-विशेष से स्थापित किया जाएगा तो पाठ सरल बन जाएगा तथा छात्रों की रुचि अधिक देर तक उसमें बनी रहेगी ।


विद्यालय में समय-सारणी


विद्यालय में समय-सारणी से निम्नलिखित


लाभ हैं


1. इसके द्वारा शिक्षकों के कार्यों का आवंटन उचित रूप से होता है। समय-तालिका में प्रत्येक शिक्षक के प्रदत्त कार्य का स्पष्टतया पता चलता है। अत: विद्यालय के पाठ्येत्तर क्रियाशीलन एवं प्रवृत्ति कार्य को शिक्षकों में समान रूप से आवंटन करना संभव होता है।


2. इसके द्वारा विद्यालय कार्य का निर्विघ्न एवं सुव्यवस्थित रूप में संचालन संभव होता है । समय-सारणी में प्रत्येक वस्तु का पहले से ही नियोजन किया जाता है। अतः प्रत्येक शिक्षक और विद्यार्थी को यह ज्ञात होता है कि किस समय उसे क्या करना है ? 3. इसके द्वारा समय और शक्ति का अपव्यय नहीं होता है।


4. यह विद्यालय कार्य को विद्यार्थियों की क्षमता एवं आवश्यकता के अनुसार समंजन करने में सहायक 5. यह विद्यालय में अनुशासन स्थापित करने


में सहायक होता है। अच्छी समय तालिका के फलस्वरूप विद्यालय के समस्त विद्यार्थी प्रत्येक समय किसी-न-किसी उपयोगी कार्य में व्यस्त रहते हैं, इसलिए उनका मन अर्थहीन प्रवृत्तियों की ओर नहीं जाता है और विद्यालय का कार्य नियमानुसार एवं व्यवस्थित रूप में सम्पन्न होता है।


6. इसके द्वारा विभिन्न विषयों में विद्यालय - समय का आवंटन उचित रूप में किया जाता है । अतः यह विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास की दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक है।


7. यह छात्रों के नैतिक विकास में भी सहायक है । प्रत्येक कार्य का समय निर्धारित होने से विद्यार्थी नियमपूर्वक समय की पाबंदी के साथ विद्यालय में आते हैं एवं विभिन्न विषयों एवं प्रवृत्तियों से संबंधित कार्यों में निश्चित समय पर भाग लेते हैं।


8. समय तालिका मानव-जीवन के महत्त्वपूर्ण मूल्यों एवं आदर्शों के प्रति आदर की भावना विकसित करने में सिद्ध होती है । समय-तालिका का प्रयोग विद्यार्थियों में कर्त्तव्यपरायणता, समयनिष्ठता एवं उद्यम - प्रियता के गुणों का विकास करती है।


9. समय तालिका छात्रों की अनावश्यक क्रियाओं पर नियंत्रण लगा देती है। समय तालिका में मध्यावकाश व खेल - कूद का समय भी निर्धारित किया जाता है तथा पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं के अवसर उपलब्ध कराये जाते हैं, जिससे छात्रों की ऊर्जा का सदुपयोग कराकर वृत्तियों का शोधन कराया जाता है। समय-सारणी के उद्देश्य - समय-सारणी के निम्नांकित उद्देश्य हैं—



अध्यापकों को उनकी योग्यता एवं रुचि के


अनुसार काम देना । विद्यालय के निरीक्षण कार्य को सरल बनाना । छात्रों और अध्यापकों में उनके कार्यों के प्रति


सजगता उत्पन्न करना ।


पाठ्यक्रम और समस्त क्रियाओं को विद्यालय


की कार्यावधि में उचित स्थान देना ।


विद्यालय के छात्रों को कार्य में लगाये रहना।


विद्यालय में होनेवाली पाठ्यक्रम सहगामी


क्रियाओं को उचित स्थान व समय प्रदान करना निर्धारित कार्यक्रम को निश्चित समय के अन्दर समाप्त करना । •


समय-तालिका तैयार करने के सिद्धांत यद्यपि उत्तम समय तालिका निर्माण के लिए कोई नियम नहीं है, जिसको आधार मानकर समस्त विद्यालय अपने लिए उत्तम समय तालिका का निर्माण कर सके, फिर भी निम्नलिखित कुछ ऐसे तथ्य हैं जिनको ध्यान में रखकर समय-तालिका का निर्माण किया जा सकता है


1. समयावधि – शिक्षा विभाग द्वारा विद्यालय सत्र की अवधि, विद्यालय दिवस की अवधि, विद्यालय के दैनिक कालांशों की संख्या एवं अवधि, प्रत्येक विषय-संबंधी, कालांश - संख्या आदि निर्धारित किए जाते हैं । प्रत्येक विद्यालय के लिए इन नियमों का पालन करना आवश्यक होता है । इसलिए समय-सारणी का निर्माण इन नियमों की सीमा के अन्तर्गत करना अपेक्षित है।


2. समय की उपलब्धता - विद्यालय कार्य के लिए कितना समय उपलब्ध है। शिक्षण वर्ष में कितना समय विद्यालय कार्य के लिए उपलब्ध रहता है, यह समय-सारणी के निर्माण में पहली विचारणीय बात है । वर्ष में विद्यालय रविवार, राजपत्रित छुट्टियों, ग्रीष्मावकाश आदि के लिए कितने दिनों तक बंद रहेगा - इनको घटाने पर कितने दिन कार्य के लिए बच जाते हैं, इन दिनों में कितनी घंटियाँ होंगी-आदि की गणना ठीक से कर लिया जाय ।


3. विषयों का महत्त्व – विषयों का सापेक्षिक महत्त्व निर्धारित किया जाय । अर्थात् शिक्षा क्रम में कितने विषय रहते हैं । इन विषयों का सापेक्षिक महत्त्व क्या है— इसे सही रूप में निश्चित कर लिया जाय । जो विषय अधिक महत्त्वपूर्ण तथा अपेक्षाकृत कठिन हैं, उनमें अन्य विषयों की अपेक्षा अधिक घंटियाँ देना आवश्यक होगा । 4. विषयों की कठिनाई – विषयों की


सापेक्षिक कठिनाइयाँ निर्धारित की जाएँ । 5. थकावट का ध्यान रखा जाय— कौन-से विषय अधिक थकान उत्पन्न करते हैं इन बातों पर विचार करना जरूरी है। जैसे—विज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र, अंग्रेजी जल्दी थकान उत्पन्न करते हैं, उन्हें प्रारंभ की घंटी में अथवा टिफिन के बाद वाली पहली घंटी में रखा जाय ।


6. विविधता के सिद्धान्त का पालन विविधता के सिद्धांत का पालन किया जाय। इस सिद्धांत के अनुसार एक विषय अथवा एक ही किस्म के विषय को अधिक देर तक छात्रों को पढ़ने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए। खासकर थकान उत्पन्न करनेवाले विषय अधिक देर तक लगातार रूप में कभी नहीं पढ़ाया जाना चाहिए ।


7. बालकों के हित संबंधी तथ्य- विद्यालय का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य बालकों के व्यक्तित्व का विकास करना है । अतः इसका सम्पूर्ण कार्यक्रम उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए निर्धारित किया जाता है। इसलिए समय-तालिका का निर्माण भी उनकी रुचि, योग्यता एवं आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए ।


8. समय चक्र – समय चक्रों की अवधि का निर्धारण बालकों की आयु के अनुसार होना चाहिए । मनोवैज्ञानिक खोज ने यह सिद्ध कर दिया है कि 6 से 9 वर्ष तक के बालक किसी विषय का 10 से 15 मिनट तक की एकाग्रचित होकर अध्ययन कर सकते हैं । 9 से 12 तथा 12 से 14 वर्ष तक के बालक क्रमश: 20 से 25 मिनट तथा 30 से 35 मिनट तक ही अपने चित को एकाग्र कर सकते हैं ।


9. शिक्षकों के हित संबंधी तथ्य – समय तालिका का निर्माण करते समय शिक्षकों की आवश्यकता पर भी ध्यान रखा जाय। इसका निर्माण ऐसे ढंग से किया जाए जिसमें उनको लगातार एक-सा कार्य न करना पड़े तथा आराम करने या अध्ययन करने के लिए अवकाश भी प्राप्त हो जाए, प्रत्येक शिक्षक को वही कार्य दिया जाए जिसमें उनकी रुचि एवं योग्यता हो। इससे शिक्षक का मानसिक सन्तुलन ठीक रहता है । प्रत्येक शिक्षक का कार्य - भार, जहाँ तक संभव हो सके, समान रहे । शिक्षकों को सीमाओं एवं मनोवृत्तियों का भी ध्यान रखना आवश्यक है।


10. विद्यालय सामग्री तथ्य – समय तालिका का निर्माण करते समय विद्यालय में उपलब्ध साधनों का भी ध्यान रखना आवश्यक है, उदाहरणार्थ – शिक्षकों की संख्या, विशेष कक्षों एवं सामान्य कक्षों की व्यवस्था एवं उसकी सामग्री, फर्नीचर, पुस्तकालय, खेल का मैदान, पाठ्यक्रम-सहगामी क्रियाओं के संचालन हेतु सामग्री, शैक्षिक सामग्री आदि जिससे बालक इनका सरलता से उपयोग कर सके ।


11. बालकों के व्यक्तित्व के अन्य पक्षों के विकास से संबंधित क्रियाओं के लिए भी समय तालिका में स्थान मिलना चाहिए । उदाहरणार्थ शारीरिक, नैतिक, नागरिक एवं सामाजिक पक्षों के विकास के लिए उन्हें समय-तालिका द्वारा खेल-कूद, व्यायाम, प्रार्थना मनोरंजन, पुस्तकालय स्वाध्याय, अवकाश आदि क्रियाओं का निश्चित समय होना चाहिए ।


विद्यालय परिसर का सौन्दर्यीकरण


विद्यालय परिसर को सुन्दर, आकर्षण और साफ रखना ही विद्यालय परिसर का सौन्दर्यीकरण कहलाता है । जर्मन भाषा में छोटे बच्चों के स्कूल को 'किण्डरगार्डेन' कहा जाता है। किण्डरगार्डेन का अर्थ होता है, बच्चों की फुलवारी । सचमुच, बच्चों के विकास के लिए फुलवारी का बड़ा गहरा संबंध है। तत्काल हमारे देश में और विशेषकर बिहार में प्राथमिक विद्यालय का सबसे बड़ी समस्या है— उपस्थिति की । नामांकन होने के बाद भी बच्चे विद्यालय आना नहीं चाहते हैं। गाय, बकरी और भैंस चराना गर्मी के दिनों में पेड़ की छाया में बैठकर गोटी खेलना या बरसात में पानी में छप छप करना उन्हें ज्यादा अच्छा लगता है। खुले वातावरण के पक्षी को विद्यालय की चहारदिवारी में कैद करके रखना आसान नहीं है । शिक्षक के लिए यह एक बड़ी चुनौती है । हरा-भरा विद्यालय एक सुन्दर, आकर्षक और स्वस्थ वातावरण प्रदान करता


अत: विद्यालय परिसर को साफ-सुथरा रखना आवश्यक है। विद्यालय को आकर्षक बनाने में सफाई का बड़ा महत्त्व है । विद्यालय परिसर के आन्तरिक तथा बाह्य भागों की सफाई के लिए निम्नांकित क्रियाशीलनों `पर ध्यान देना चाहिए


विद्यालय का कार्यक्रम सफाई से ही प्रारंभ किया जाय । इसके लिए वर्ग छात्र के लिए दिन और समय का निर्धारण कर दिया जाय। प्रत्येक दिन शेष छात्रों को परिसर में ईंट, खपड़ों के टुकड़ों, पत्ते, खरपात को एकत्र कर, नियत स्थान पर जमा करने का आदत डाली जाय । सप्ताह में एक दिन गहन सफाई का कार्यक्रम रखा जा सकता है। इसके अन्तर्गत प्रांगण की सफाई के अतिरिक्त दीवारों, किवाड़, खिड़की, उपस्कर झाड़ने -पोंछने का कार्य कराया जा सकता है । जहाँ कक्षाएँ भवन पेड़ के नीचे लगती हैं और फर्श को गीले कपड़ों से पोछा जाय । विद्यालय को स्वच्छ रखने के लिए मल-मूत्र, थूक, कूड़ा-कचड़ा, नली, पानी आदि के लिए स्थान नियत करना जरूरी है। स्थानीय सामग्री, यथा-लकड़ी, बाँस, खर-पतवार, टीन- कनस्तर, घास-फूस, ईंट के टुकड़ों से इन्हें बनाना बहुत आसान है। बच्चों को इन्हें बनाने की विधि एवं व्यवहार करने के तरीके से अवगत कराना आवश्यक है । महीने में एक बार दीवारों के झोल एवं धूल झाड़ना चित्रों को पोछना, खिड़की, किवाड़ों को गीले कपड़े से पोंछना जरूरी है ।


दीवारों पर सूक्ति-लेखन - दीवारों पर लाल या पीले रंग से महापुरुषों की सूक्तियों को लिख देना चाहिए । इसे पढ़कर बच्चे प्रेरणा ग्रहण करते हैं तथा प्रभावित होते हैं ।


पेय जल — दूषित जल अनेक रोगों का कारण है । विद्यालय में साफ पेयजल कपड़े से छानकर एवं ढँक कर रखने की आदत डालना भी आवश्यक है । पेयजल निकालने के लिए हत्थायुक्त बर्तन का व्यवहार करना चाहिए। पेयजल स्थल को सदैव साफ एवं सूखा रखना जरूरी होता है ।


काम समाप्ति के बाद या खाने से पूर्व बच्चों


में अच्छी तरह से हाथ-पैर एवं मुँह की सफाई करने की आदत डालना जरूरी होता है । बागवानी – विद्यालय परिसर को सुन्दर तथा आकर्षक बनाने के लिए बागवानी होना आवश्यक है । फूल के पौधों को छोटे-छोटे क्यारियों तथा गमलों में


लगाया जा सकता है।


बगान की योजना पहले कागज पर बना लेना चाहिए । विद्यालय भवन और सड़क को ध्यान में रखते हुए पहले विद्यालय को सड़क से जोड़ने वाले रास्ते को रेखांकित करना चाहिए । विद्यालय के अन्दर का रास्ता सीधी रेखा में या वृत्ताकार हो सकता है। भवन के सामने या बगल में झंडा चबूतरा का स्थान निर्धारित करना चाहिए । बगान के लिए चारों ओर घेरा होना जरूरी है। घेरा तार, बाँस या पौधा का हो सकता है विद्यालय की जमीन में अगर पहले से कोई छायादार.. वृक्ष न हो तो फूल-फल वाले छायादार वृक्ष लगाना चाहिए । कागज पर पेड़ का स्थान संकेत द्वारा निर्धारित करें। पेड़ का स्थान भवन से थोड़ा हटकर पीछे या बगल की ओर होना चाहिए। झाड़ीदार पौधों का स्थान घेरे से लगी लम्बी कतार में होना चाहिए ताकि झाड़ियाँ रास्ते को अवरुद्ध न करें। लताएँ गेट के निकट मचान बनाकर या भवन के निकट लगाकर भवन के ऊपर चढ़ा देना चाहिए । रास्ते के दोनों ओर छोटे आकार के मौसमी फूल लगाना चाहिए । इसमें ज्यादा काट-छाँट और सफाई की जरूरत नहीं होती है । खाली जमीन में घास लगा सकते हैं। घास के बीच आयताकार या वृत्ताकार क्यारी बनाकर गुलाब के या अन्य मौसमी फूल लगा सकते हैं। पेड़-पौधे ज्यादातर बरसात के मौसम में लगाना चाहिए। बच्चों एवं उनके अभिभावकों की सहायता से यह काम बहुत आसानी से हो सकता है। बच्चे बगान लगाते हैं तो उनको पेड़-पौधों से लगाव बढ़ जाता है और बगान को नष्ट नहीं करते। विद्यालय के अहाते पर गुलमोहर, अमलतास, कदम, चम्पा, कटहल, आम, सागवान, मौलसरी के पेड़ तथा क्यारी में गुलाब, बेला, गेंदा, जटाधारी, सूरजमुखी, चीरामीरा, सूरजमुखी गुलदाउदी, डहेलिया, सदाबहार आदि फूलों को लगाया जा सकता है । विद्यालय के अहाते को घेरने के लिए कुछ लताएँ लगायी जा सकती हैं। बच्चों के मनोरंजन हेतु कुछ खेल का सामान, जैसे— झूला, फिस्लू, सी-सॉ, आदि सामानों का रहना आवश्यक है। इन सब चीजों के रहने से विद्यालय में बच्चों की उपस्थिति बढ़ने की संभावना बढ़ती है ।







आन्तरिक आकर्षण - विद्यालय परिसर की सफाई एवं सजावट तो मात्र बाह्य आकर्षण हैं, सही अर्थ में विद्यालय तभी आकर्षक माना जाता है, जब वह बाह्य रूप से आकर्षक होने के साथ-साथ आन्तरिक रूप से भी आकर्षक हो। इसके अन्तर्गत कई बातें आती हैं यथा— (i) विद्यालय की उपलब्धि, (ii) विद्यालय का आकर्षण एवं छात्रों का सुसंस्कृत होना, (iii) विद्यालय उपस्कर, संरजाम आदि का उचित रख-रखाव, (iv) शिक्षकों में मेलजोल, (v) विद्यालय के शैक्षिक एवं शिक्षकेत्तर कार्यकलाप, (vi) समुदाय के साथ विद्यालय का मधुर संबंध, (vii) शान्त, सुखद वातावरण आदि ।



हर्षोल्लास का वातावरण – उदासीनता एवं चिन्ता को त्याग कर सभी बच्चे हमेशा मुस्कुराते रहें । सुस्मित चेहरे का प्रभाव वातावरण को उल्लसित करने में सहायक होता है। शिक्षक ऐसा वातावरण बनावें जिसमें बच्चे निर्भय एवं प्रफुल्लित रहकर अपने मन की बात रख सकें ।



इस तरह से उपर्युक्त सभी दिशाओं में कार्यकलाप आरंभ होते ही विद्यालय का आकर्षण बढ़ता जायगा एवं विद्यालय सौन्दर्ययुक्त हो जायगा ।



बच्चों के गुण का विकास करना



बच्चों के गुण के विकास में निम्नलिखित कारक होना चाहिए 1. आत्म नियंत्रण अच्छे चरित्र के बच्चों में आत्म नियंत्रण का गुण होता है। उसे अपने विचारों,



व्यवहारों, इच्छाओं, भावनाओं आदि पर अधिकार होता





2. विश्वसनीयता अच्छे चरित्र के बच्चों में विश्वसनीयता का गुण होता है और प्रत्येक परिस्थिति में उसका विश्वास किया जा सकता है। इसका कारण यह है कि वह सदैव किसी आदर्श या सिद्धान्त के अनुसार कार्य करता है। वह किसी सनक या क्षणिक के कारण उससे विचलित नहीं होता है। इसके अतिरिक्त, वह एक सी परिस्थितियों में एक-सा ही व्यवहार करता है। उसके व्यवहार को देखकर उसके परिणाम की भविष्यवाणी की जा सकती है ।



3. कार्य में दृढ़ता- अच्छे चरित्र के बच्चों का एक विशेष गुण हैं— कार्य में दृढ़ता । वह जिस कार्य को आरम्भ करता है, उसे समाप्त अवश्य करता है वह



4. कर्मनिष्ठा – अच्छे चरित्र के बच्चों में कर्मनिष्ठा का गुण होता है । वह प्रत्येक कार्य को पूर्ण परिश्रम से करता है। कार्य भले ही नीरस हो, पर वह



5. अन्तःकरण की शुद्धता- अच्छे चरित्र के बच्चों का एक मुख्य गुण है- अन्तःकरण की शुद्धता । उसके कर्म, वचन और व्यवहार में छल की छाया भी नहीं होती है ।



6. उत्तरदायित्व की भावना – अच्छे चरित्र के बच्चों में उत्तरदायित्व की भावना होती है। वह महान कष्ट झेलकर भी उत्तरदायित्व का निर्वाह करता है शिक्षा को बालक के गुण के विकास के योग देने के लिए अनेक विधियों को अपनाया जा सकता है, यथा



1. बालक को नियमित रूप से नैतिक शिक्षा देनी चाहिए ।



अवांछनीय स्थायीभाव न उत्पन्न हों 5. बालक के प्रति प्रेम, दया और सहानुभूति का व्यवहार करके, उसमें इन स्थायीभावों को उत्पन्न करना चाहिए ।



6. बालक की मूल प्रवृत्तियों का दमन नहीं करना चाहिए । ऐसा करने से उसके मस्तिष्क में ग्रन्थियाँ बन जाती हैं। फलस्वरूप, उसमें दुर्गुण और बुरी प्रवृत्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं ।


9. बालक में अच्छी आदतों का निर्माण करना चाहिए और उसकी इच्छा-शक्ति को दृढ़ बनाने का प्रयास करना चाहिए ।



10. बालक के चरित्र का विकास करने के लिए उसके व्यक्तित्व से सब अंगों का विकास करना चाहिए ।



| बच्चों को देय दण्ड / सुधारने का उपाय

बगान की योजना पहले कागज पर बना लेना चाहिए । विद्यालय भवन और सड़क को ध्यान में रखते हुए पहले विद्यालय को सड़क से जोड़ने वाले रास्ते को रेखांकित करना चाहिए । विद्यालय के अन्दर का रास्ता सीधी रेखा में या वृत्ताकार हो सकता है। भवन के सामने या बगल में झंडा चबूतरा का स्थान निर्धारित करना चाहिए । बगान के लिए चारों ओर घेरा होना जरूरी है। घेरा तार, बाँस या पौधा का हो सकता है विद्यालय की जमीन में अगर पहले से कोई छायादार.. वृक्ष न हो तो फूल-फल वाले छायादार वृक्ष लगाना चाहिए । कागज पर पेड़ का स्थान संकेत द्वारा निर्धारित करें। पेड़ का स्थान भवन से थोड़ा हटकर पीछे या बगल की ओर होना चाहिए। झाड़ीदार पौधों का स्थान घेरे से लगी लम्बी कतार में होना चाहिए ताकि झाड़ियाँ रास्ते को अवरुद्ध न करें। लताएँ गेट के निकट मचान बनाकर या भवन के निकट लगाकर भवन के ऊपर चढ़ा देना चाहिए । रास्ते के दोनों ओर छोटे आकार के मौसमी फूल लगाना चाहिए । इसमें ज्यादा काट-छाँट और सफाई की जरूरत नहीं होती है । खाली जमीन में घास लगा सकते हैं। घास के बीच आयताकार या वृत्ताकार क्यारी बनाकर गुलाब के या अन्य मौसमी फूल लगा सकते हैं। पेड़-पौधे ज्यादातर बरसात के मौसम में लगाना चाहिए। बच्चों एवं उनके अभिभावकों की सहायता से यह काम बहुत आसानी से हो सकता है। बच्चे बगान लगाते हैं तो उनको पेड़-पौधों से लगाव बढ़ जाता है और बगान को नष्ट नहीं करते। विद्यालय के अहाते पर गुलमोहर, अमलतास, कदम, चम्पा, कटहल, आम, सागवान, मौलसरी के पेड़ तथा क्यारी में गुलाब, बेला, गेंदा, जटाधारी, सूरजमुखी, चीरामीरा, सूरजमुखी गुलदाउदी, डहेलिया, सदाबहार आदि फूलों को लगाया जा सकता है । विद्यालय के अहाते को घेरने के लिए कुछ लताएँ लगायी जा सकती हैं। बच्चों के मनोरंजन हेतु कुछ खेल का सामान, जैसे— झूला, फिस्लू, सी-सॉ, आदि सामानों का रहना आवश्यक है। इन सब चीजों के रहने से विद्यालय में बच्चों की उपस्थिति बढ़ने की संभावना बढ़ती है । आन्तरिक आकर्षण - विद्यालय परिसर की सफाई एवं सजावट तो मात्र बाह्य आकर्षण हैं, सही अर्थ में विद्यालय तभी आकर्षक माना जाता है, जब वह बाह्य रूप से आकर्षक होने के साथ-साथ आन्तरिक रूप से भी आकर्षक हो। इसके अन्तर्गत कई बातें आती हैं यथा— (i) विद्यालय की उपलब्धि, (ii) विद्यालय का आकर्षण एवं छात्रों का सुसंस्कृत होना, (iii) विद्यालय उपस्कर, संरजाम आदि का उचित रख-रखाव, (iv) शिक्षकों में मेलजोल, (v) विद्यालय के शैक्षिक एवं शिक्षकेत्तर कार्यकलाप, (vi) समुदाय के साथ विद्यालय का मधुर संबंध, (vii) शान्त, सुखद वातावरण आदि । हर्षोल्लास का वातावरण – उदासीनता एवं चिन्ता को त्याग कर सभी बच्चे हमेशा मुस्कुराते रहें । सुस्मित चेहरे का प्रभाव वातावरण को उल्लसित करने में सहायक होता है। शिक्षक ऐसा वातावरण बनावें जिसमें बच्चे निर्भय एवं प्रफुल्लित रहकर अपने मन की बात रख सकें । इस तरह से उपर्युक्त सभी दिशाओं में कार्यकलाप आरंभ होते ही विद्यालय का आकर्षण बढ़ता जायगा एवं विद्यालय सौन्दर्ययुक्त हो जायगा । बच्चों के गुण का विकास करना बच्चों के गुण के विकास में निम्नलिखित कारक होना चाहिए 1. आत्म नियंत्रण अच्छे चरित्र के बच्चों में आत्म नियंत्रण का गुण होता है। उसे अपने विचारों, व्यवहारों, इच्छाओं, भावनाओं आदि पर अधिकार होता 2. विश्वसनीयता अच्छे चरित्र के बच्चों में विश्वसनीयता का गुण होता है और प्रत्येक परिस्थिति में उसका विश्वास किया जा सकता है। इसका कारण यह है कि वह सदैव किसी आदर्श या सिद्धान्त के अनुसार कार्य करता है। वह किसी सनक या क्षणिक के कारण उससे विचलित नहीं होता है। इसके अतिरिक्त, वह एक सी परिस्थितियों में एक-सा ही व्यवहार करता है। उसके व्यवहार को देखकर उसके परिणाम की भविष्यवाणी की जा सकती है । 3. कार्य में दृढ़ता- अच्छे चरित्र के बच्चों का एक विशेष गुण हैं— कार्य में दृढ़ता । वह जिस कार्य को आरम्भ करता है, उसे समाप्त अवश्य करता है वह 4. कर्मनिष्ठा – अच्छे चरित्र के बच्चों में कर्मनिष्ठा का गुण होता है । वह प्रत्येक कार्य को पूर्ण परिश्रम से करता है। कार्य भले ही नीरस हो, पर वह 5. अन्तःकरण की शुद्धता- अच्छे चरित्र के बच्चों का एक मुख्य गुण है- अन्तःकरण की शुद्धता । उसके कर्म, वचन और व्यवहार में छल की छाया भी नहीं होती है । 6. उत्तरदायित्व की भावना – अच्छे चरित्र के बच्चों में उत्तरदायित्व की भावना होती है। वह महान कष्ट झेलकर भी उत्तरदायित्व का निर्वाह करता है शिक्षा को बालक के गुण के विकास के योग देने के लिए अनेक विधियों को अपनाया जा सकता है, यथा अवांछनीय स्थायीभाव न उत्पन्न हों 5. बालक के प्रति प्रेम, दया और सहानुभूति का व्यवहार करके, उसमें इन स्थायीभावों को उत्पन्न करना चाहिए । 6. बालक की मूल प्रवृत्तियों का दमन नहीं करना चाहिए । ऐसा करने से उसके मस्तिष्क में ग्रन्थियाँ बन जाती हैं। फलस्वरूप, उसमें दुर्गुण और बुरी प्रवृत्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं । 9. बालक में अच्छी आदतों का निर्माण करना चाहिए और उसकी इच्छा-शक्ति को दृढ़ बनाने का प्रयास करना चाहिए । 10. बालक के चरित्र का विकास करने के लिए उसके व्यक्तित्व से सब अंगों का विकास करना चाहिए । | बच्चों को देय दण्ड / सुधारने का उपाय शारीरिक दण्ड देना भी उचित नहीं है। अब शिक्षकों द्वारा थप्पड़ मारने की प्रथा को भी हतोत्साहित किया जाता है। केवल प्रधानाध्यापक ही विशेष परिस्थिति में इसका उपयोग कर सकता है। भारतीय संघ के प्राय: सभी राज्यों में शारीरिक दण्ड के प्रयोग के लिए शिक्षा-विभाग द्वारा ढंग एवं परिस्थितियों का निर्धारण कर दिया गया है । दण्ड का एक महत्त्वपूर्ण रूप निलम्बन तथा निष्कासन (Suspension and Expulsion) है । परन्तु इनका प्रयोग गम्भीर परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए । इनका तभी उपयोग किया जाय जब समस्त प्रकार से बालक को सही मार्ग पर लाना असम्भव हो जाय । यह विद्यालय-अधिकारियों के हाथ में अन्तिम अस्त्र है। इसका उपयोग बहुत ही कम किया जाना चाहिए ।

यदि दण्ड देना पड़े तो वह सुधार करने के उद्देश्य


से दिया जाना चाहिए । इसके अतिरिक्त दण्ड देते समय निम्न बातों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए 1. दण्ड प्रदान करने से पूर्व अपराध के कारणों एवं परिस्थितियों का ज्ञान प्राप्त किया जाय और उन


• दूषित परिस्थितियों को सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए ।


2. इनसे अवगत होने के पश्चात् बालक को अपनी गलती का अनुभव कराया जाय तथा भविष्य में ऐसा न करने के लिए चेतावनी दी जाय । यदि वह फिर भी ऐसा करता है तो उसके लिए दण्ड व्यवस्था की जाय परन्तु दण्ड देते समय बालक की आयु, स्वभाव, विचारधारा आदि को ध्यान में रखा जाय । 3. दण्ड प्रदान करने में निष्पक्षता रखी जाय। 4. दण्ड अपराध के अनुकूल दिया जाय तथा . उससे अधिक या कम मात्रा में नहीं दिया जाना चाहिए । 5. दण्ड प्रदान करने में, यदि सम्भव हो सके तो बालकों के अभिभावकों से भी सलाह ली जाय । इसके साथ ही बालकों की छात्र-परिषद् की सम्मति को ध्यान रखा जाय। इससे सामूहिक अनुशासनहीनता की समस्या उत्पन्न नहीं हो पाएगी।


बिहार शिक्षा परियोजना


बिहार शिक्षा परियोजना की स्थापना के उद्देश्य – सार्वजनिक शिक्षा हमारा संवैधानिक दा है । संविधान की धारा-45 में, जिसे सन् 1949 में अंगीकार किया गया था, संविधान के लागू होने के दस वर्ष के भीतर 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने की व्यवस्था की जानी थी, किन्तु जनसंख्या विस्फोट के कारण हम सबके लिए शिक्षा की व्यवस्था नहीं कर पाए हैं। बिहार शिक्षा परियोजना प्राथमिक शिक्षा के सार्वजनीकरण के उद्देश्य से सबके लिए शिक्षा का लक्ष्य प्राप्त करने हेतु एक नई शुरुआत । सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति एवं महिलाओं के बीच शिक्षा के प्रसार-प्रचार को इस परियोजना का विशेष कार्यक्षेत्र माना गया है। प्राथमिक शिक्षा का सर्वव्यापीकरण औपचारिक शिक्षा व्यवस्था से कर पाना संभव नहीं है। इस माध्यम से सभी बच्चों को शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है । शिक्षा के सार्वजनिक तथा सर्वव्यापीकरण के लिए यह आवश्यक है कि प्राथमिक शिक्षा में गुणात्मक सुधार द्वारा छीजन रोका जाय और साथ-साथ सुविधावंचित वर्ग के बच्चों एवं कामगार बच्चों के लिए चलाई जा रही अनौपचारिक शिक्षा योजना का सुदृढ़ीकरण किया जाय। बिहार शिक्षा परियोजना के परिलेख में शिक्षा के सभी प्रक्षेत्रों में गुणात्मक सुधार पर विशेष बल दिया गया है। शिक्षा में संस्कृति की भूमिका एवं ग्रामीण पुस्तकालयों की पुनः स्थापना तथा अनवरत् शिक्षा की व्यवस्था इस परियोजना की आन्तरिक विशेषताएँ हैं । बिहार शिक्षा परियोजना में शिक्षक को शिक्षा की धुरी माना गया है जिनके सहयोग से हम शिक्षा सबके लिए, सूक्ष्म स्तरीय योजना, विद्यालय मानचित्रण, न्यूनतम, अधिगम स्तर की दक्षता पर आधारित पूर्ण प्राप्ति के लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं। विद्यालय शिक्षण कार्य में गुणवत्ता, छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, विद्यालय को आकर्षक बनाना तथा शैक्षिक विकास में अभिभावक एवं समुदाय की प्रतिभागिता को अधिक सुदृढ़ कर सकते हैं। शिक्षकों में नैतिक बल जागृत करने एवं शिक्षा प्रदान करने के विविध तरीकों से अवगत कराने हेतु प्रशिक्ष लिए जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना का प्रयास इस परियोजना द्वारा किया जा रहा है।



परियोजना के लिए निधि की व्यवस्था के तीन स्रोत – यूनिसेफ, भारत सरकार और बिहार सरकार से की जा रही है। यूनिसेफ, भारत और बिहार सरकार का अंशदान का अनुपात 3: 2:1 है।


बिहार शिक्षा परियोजना के अन्तर्गत प्राथमिक शिक्षा में गुणात्मक सुधार लाने हेतु निम्नलिखित प्रक्षेत्रों में विभिन्न क्रियाकलापों को कार्यान्वित किया जा रहा है


1. प्राथमिक औपचारिक शिक्षा : (i) 4 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा की सुविधा प्रदान करना – सर्वव्यापी पहुँच की व्यवस्था करना, (ii) औपचारिक या अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रमों के द्वारा प्राथमिक स्तर को पूरा करने तक सर्वव्यापी भागीदारी सुनिश्चित करना, (ii) सर्वव्यापी उपलब्धि- न्यूनतम अधिगम स्तर की उपलब्धि सुनिश्चित करना, (iv) बालिकाओं और सुविधावंचित वर्ग के बच्चों में यह उपलब्धि सुनिश्चित करने हेतु निम्नांकित कार्यों का प्रावधान है -


a. शिक्षक-व्यवहार एवं शिक्षण-व्यवहार में सुधार लाना । साथ ही प्रशिक्षण में सुधार लाना, b. समुदाय से सहयोग एवं भागीदारी, C. स्थानीय स्तर पर साधन / संसाधन का निर्माण, d. शैक्षिक प्रशासन में सुधार एवं उसका विकेन्द्रीकरण, e. विद्यालीय सुविधाओं में विस्तार लाना ।


2. सबके लिए शिक्षा की व्यवस्था करना, विद्यालय में बच्चों की उपस्थिति बढ़ाना और छीजन रोकने के लिए निम्नांकित उपाय करना (i) महिला समूह, ग्राम स्तरीय संगठन को अधिक सक्रिय बनाना ।


(ii) शिक्षा के क्षेत्र में अनेक प्रकार के


क्रियाकलापों, बाल मेला, अभिभावक शिक्षक बैठकें, खेलकूद एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन । (iii) विद्यालय प्रबन्ध, व्यवस्था एवं प्रशासन में सुधार लाना ।


(iv) शिक्षकों की कार्यशालाएँ आयोजित करना ।


(v) शिक्षाकर्मी, आश्रमशाला योजना का


प्रायोजित परीक्षण करना । (vi) स्थानीय समुदाय को अभिप्रेरित कर विद्यालय भवन निर्माण


3. शिक्षण अधिगम स्थिति में सुधार-बच्चों में उपलब्धि स्तर के अनुकूल संप्राप्ति हो सके और वे प्राथमिक स्तर तक पढ़ाई जारी रख सकें। इसके लिए शिक्षण अधिगम स्थिति में सुधार लाने के लिए प्रयास करना ।


4. अनौपचारिक शिक्षा व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण — विद्यालीय शिक्षा सुविधा से वंचित बच्चे-बच्चियों के लिए अनौपचारिक शिक्षा व्यवस्था द्वारा प्राथमिक शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है


5. वयस्क शिक्षा व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण - शिक्षा के प्रति लोगों में सकारात्मक दृष्टिकोण पैदा करने के लिए वयस्क शिक्षा की ओर वयस्कों में अभिरूचि पैदा करना । इसके लिए वयस्क महिलाओं एवं पुरुषों के लिए वयस्क शिक्षा व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण बिहार शिक्षा परियोजना के अन्तर्गत किया जाएगा।


6. बालपन की देख-भाल एवं पूर्वप्राथमिक शिक्षा-बालकों की उचित देख-भाल एवं सांस्कृतिक


परिवेश के अनुरूप शिक्षा प्रदान करने के लिए बिहार शिक्षा परियोजना में अनेक उपाय किए जा रहे हैं : (i) 0-3 वर्ष के बच्चों के लिए स्वस्थ घरेलू वातावरण एवं आकार का विकास करना ।


(ii) 3–6 वर्ष के बच्चों के लिए पूर्व प्राथमिक


शिक्षा की सुविधा प्रदान करना ।


(iii) प्रखंडों में समन्वित बाल विकास योजना चलाना जैसे—बालबाड़ी, पोषाहार केन्द्र आदि । (iv) नवीन माइक्रोपरियोजनाओं से प्राप्त अनुभवों, मिडिया का प्रायोगिक उपयोग आदि का


समावेश करना । 7. महिला समस्या — ग्रामीण महिलाओं तथा बालिकाओं को सुनिश्चित करने के लिए बिहार शिक्षा परियोजना के अन्तर्गत समस्या परियोजना भी कार्यरत है ।


| प्राचीन बिहार के मुख्य शिक्षण संस्थान


प्राचीन काल से ही भारत शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी रहा है। प्राचीन काल में भारत में अनेक प्रख्यात विश्वविद्यालय थे । उनमें से तक्षशिक्षा, नालन्दा तथा विक्रमशिला विश्वविद्यालय अत्यन्त ही प्रसिद्ध थे । यहाँ दूर- देशों से विद्यार्थी विद्याध्ययन के लिए आते थे ।


नालन्दा विश्वविद्यालय तथा विक्रमशिला


विश्वविद्यालय प्राचीन बिहार के अन्तर्गत स्थित थे । नालन्दा विश्वविद्यालय - नालन्दा प्राचीन काल में बौद्ध धर्म के रूप में विख्यात था । लगभग 450 ई. से यह विद्या केन्द्र के रूप में विकसित होने लगा । इस स्थान को हिन्दू तथा बौद्ध दोनों ही प्रकार के नागरिकों की श्रद्धा प्राप्त थी। इसको विद्याकेन्द्र के रूप में विकसित करने के लिए सबसे अधिक दान गुप्त राजाओं से प्राप्त हुआ था । उत्तरकालीन गुप्त सम्राटों में से एक ने पांचवीं शताब्दी में इसे स्थापित किया था ।


विश्वविद्यालय परिसर : नालन्दा में मुख्य विद्यालय के साथ छ: बड़े-बड़े व्याख्यान भवन थे । अध्यापन के लिए लगभग तीन सौ छोटे कमरे थे । सभी भवन अत्यन्त भव्य एवं ऊँचे थे । विद्यार्थियों के निवास के लिए बहुत से छोटे-छोटे कमरे थे । प्रत्येक विद्यार्थी को एक पत्थर की शयिका मिलती थी । प्रत्येक । कमरे में दीपक और पुस्तकें रखने हेतु व्यवस्थित स्थान थे । विश्वविद्यालय को दान में लगभग दो सौ गाँव मिले हुए थे । इनकी आय से बौद्ध तथा अन्य सभी विद्यार्थियों के लिए मुफ्त भोजन एवं आवासी व्यवस्था की जाती थी। विद्यार्थियों की संख्या के सम्बन्ध में इतिहासकारों में मतभेद है। संभव है वह काल क्रम में घटती-बढ़ती रही हो, किन्तु इतना तो तय है कि सातवीं शताब्दी के मध्य में वहाँ तीन से पाँच हजार तक विद्यार्थी रहते थे ।


पवित्रता एवं विद्वता : नालन्दा विश्वविद्यालय में पवित्रता एवं पाण्डित्य का अद्भूत मेल था । यहाँ के कुलपति एवं अन्य भिक्षु आचार्य अपने प्रकाण्ड पाण्डित्य एवं निर्मल चरित्र के लिए समान रूप से विख्यात थे। ये विद्वान अध्ययन एवं अध्यापन के साथ-साथ बहुमूल्य ग्रंथों की रचना भी करते थे । विश्वविद्यालय के नाम-यश से आकर्षित होकर न केवल भारत के कोने-कोने से बल्कि विदेशों से भी विद्यार्थी ज्ञानार्जन हेतु आते रहते थे। चीनी विद्यार्थियों में फाहियान तथा इसिंग प्रमुख माने जाते हैं । यहाँ


एक विशाल पुस्तकालय था, जो तत्कालीन विश्व का सबसे बड़ा पुस्तकालय था । यह भी विद्यार्थियों एवं विद्वानों के आकर्षण का एक प्रमुख कारण था । विश्वविद्यालय का पाठ्यक्रम : इस विश्वविद्यालय का पाठ्यक्रम अत्यन्त विस्तृत था । नालन्दा महायान बौद्धों का विहार था, फिर भी यहाँ हीनयान की भी पुस्तकें पढ़ी-पढ़ाई जाती थी । व्याकरण, न्याय और साहित्य तो हिन्दू और बौद्ध सबके अध्ययन के विषय थे । हिन्दू और बौद्ध धर्म एवं दर्शनशास्त्र भी परस्पर इस प्रकार मिले जुले थे कि उनमें पारंगत होने के लिए दोनों का ही अध्ययन आवश्यक समझा जाता था । इससे प्रकट होता है कि हिन्दू तथा बौद्ध धर्म तथा जीवन-दर्शन से सम्बद्ध समस्त विषयों के पाठ्यक्रम की यहाँ व्यवस्था थी । यह इस काल में भारत की धार्मिक सहिष्णुता का प्रबल प्रमाण है कि एक बौद्ध विहार में हिन्दू धर्म शास्त्रों को तथा हिन्दू विद्यार्थियों को समान अवसर प्राप्त था । साथ ही, हिन्दू राजाओं का श्रेष्ठियों तथा नागरिकों का मुक्त हस्त दान भी उस विहार को उपलब्ध होता रहता था ।


नालन्दा विश्वविद्यालय में सुयोग्य शिक्षक रहते थे । अपने विषय की पूर्ण जानकारी होने के कारण विद्यार्थियों के आगे विषयों को स्पष्ट करने तथा समझाने में वे सफल रहा करते थे। विश्वविद्यालय के बाहर शिक्षक विद्यार्थियों के संरक्षक का भी काम करते थे । उनका व्यक्तित्व एवं चरित्र अनुकरणीय होता था । मोहम्मद बिन बख्यितयार खिलजी ने बारहवीं शताब्दी के अंत में आक्रमण के दौरान इस विश्वविद्यालय को नष्ट कर डाला ।


विक्रमशिला विश्वविद्यालय - यह विश्व विद्यालय बिहार के कहलगाँव (भागलपुर से 24 मील पूरब पथरघाट) के निकट स्थित था। यह विश्वविद्यालय भी प्राचीन बिहार में काफी ख्याति प्राप्त था । अपने उत्कर्स के समय इसे एक अन्तर्राष्ट्रीय ज्ञान मन्दिर के रूप मे जाना जाता था । पालवंशी नरेश धर्मपाल ने 8वीं शताब्दी इस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी । 11वीं शताब्दी मे यह शिक्षा का महान केन्द्र था । यहाँ पर धार्मिक साहित्यिक तथा लौकिक शिक्षा का उत्तम प्रबन्ध था, जिसमें वेद और शिल्प विद्याएँ प्रमुख थे । यहाँ पर अध्ययन करनेवालों में तिब्बतियों की संख्या अधिक थी। विक्रमशिला तंत्र विद्या का भी एक महान केन्द्र था। दीपांकरश्री ज्ञान विक्रमशिला विश्वविद्यालय के विद्वानों में सर्वाधिक ख्यातिप्राप्त थे । यहाँ से शिक्षा प्राप्त स्नातकों के समावर्तन के अवसर पर बंगाल के पाल राजा कुलपति की हैसियत से विद्यार्थियों को उपाधियाँ एवं प्रमाण-पत्र वितरित करते थे ।


• लगातार चार शताब्दियों तक यह संस्था ज्ञान का प्रकाश विखेरती रही । यह विश्वविद्यालय विशालता की अपेक्षा विशेषता के लिए प्रसिद्ध थीं । यहाँ नालन्दा के समान अधिक विषयों का अध्यापन नहीं होता था, किन्तु व्याकरण, न्यास तत्त्व ज्ञान, तंत्र तथा कर्मकाण्ड आदि जिन विषयों का अध्यापन होता था, उनका अत्यन्त ही ठोस ज्ञान विद्यार्थियों को प्राप्त होता था । इस विश्वविद्यालय का सम्बन्ध तिब्बत से व्यापक रूप से रहा था। 1200 ई. के आसपास एक भीषण आक्रमण यह महाविहार नष्ट हो गया।






आधार पर




(C) एक सभ्य व्यक्ति के अनुभवों के आधार पर




(D) एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में जो दूसरे




व्यक्तियों में परिवर्तन लाती है





(B) विद्यालयी शिक्षा के पर्यायवाची शब्द के




रूप में




(C) ज्ञानार्जन के रूप में





3. शिक्षा के उद्देश्यों का मूलभूत स्रोत है— (A) मानव अनुभव (B) शिक्षा प्रदान करने वाले कॉलेज




(C) व्यावसायिक संगठन




(D) शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षा के लक्ष्यों के निर्धारण में प्राथमिक




दायित्वों का निर्वाह किया जाना चाहिए




(A) शिक्षक को (B) प्रशासकों को




(C) पाठ्य-पुस्तक लेखक को (D) समाज को




5. किसी विशेष के लिए उद्देश्यों का निर्धारण किया जाना चाहिए




(A) शिक्षक के द्वारा (B) सामान्य व्यक्ति द्वारा




(C) विषय-वस्तु के आधार पर




(D) विषय-वस्तु एवं कक्षा में सम्पन्न होने




वाली क्रियाओं के द्वारा शिक्षा का वास्तविक 6. लक्ष्य होना




चाहिए (A) उपाधि एवं प्रमाणपत्रों का संग्रह




करना (B) कौशलों, आदतों तथा ज्ञान की प्राप्ति




करना




(C) जीवन जीने का प्रशिक्षण प्राप्त करना (D) विषय-वस्तु पर अधिकार प्रयास करना




7. आधुनिक शिक्षा के लक्ष्य के रूप में निम्नलिखित में से कौनसा पद सर्वाधिक अनुपयुक्त एवं विवादास्पद है ? (A) बालक को विद्यालयी शिक्षण के माध्यम से सामाजिक सम्बन्धों का अभिप्राय




बताना




(B) बालकों में पढ़ने, लिखने, बोलने एवं सुनने की दक्षताओं का विकास करना





(D) बालकों को उनके स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों का ज्ञान प्रदान करना




नर्सरी स्कूल का प्रमुख उद्देश्य है— (A) शिशुओं की विकासात्मक आवश्यक




ताओं का समाधान करना




(B) शिशुओं की देखभाल करना, जबकि उनके माता-पिता कार्य हेतु घर से बाहर चले जाते हैं




(C) प्रत्याशित प्रारम्भिक शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान करना




(D) शिशुओं को मनोरंजन के सामूहिक अवसर प्रदान करना




9. वह विद्यालय जो बालकों में उत्तम आदतों एवं सामाजिक प्रशिक्षण पर बल देता है, उसे कहते हैं




(A) महाविद्यालय




(B) हायर सेकेण्डरी स्कूल




(C) प्राथमिक विद्यालय




(D) नर्सरी स्कूल एवं किण्डरगार्डेन 10. निम्नलिखित में से कौनसा कार्य प्रौढ़ शिक्षा




का नहीं है ? (A) उपचारात्मक शिक्षा का प्रबन्ध करना




(B) मनोरंजनात्मक शिक्षा का प्रबन्ध करना




(C) व्यावसायिक शिक्षा का प्रबन्ध करना




(D) निरक्षरता उन्मूलन




11. विद्यालय में प्रजातांत्रिक मूल्यों के संरक्षण एवं परख के लिए निम्नलिखित में से कौनसी कसौटी सर्वथा उपयुक्त है ? (A) क्या विद्यालय के विद्यार्थियों एवं




अध्यापकों के मध्य मित्रवत् व्यक्तिगत




सम्बन्ध स्थापति हो चुके हैं ? (B) क्या विद्यालय में सामान्य शिक्षा की प्रगति के लिए छात्रों के विविध एवं संवर्द्धित अनुभव प्रदान किए गए हैं ?




(C) क्या विद्यालय परिस्थतियाँ अपने छात्रों के ज्ञान एवं आवश्यकताओं को प्रोन्नत करने में सफल हुई है ? (D) उपर्युक्त सभी कथन सत्य हैं




12. हमारी प्रजातांत्रिक शैक्षिक पद्धति जोर देती




है—




(A) समस्त नागरिकों में एकसमान विचारों को




प्रोन्नत करना (B) व्यक्तिगत विभिन्नताओं को समरूपीय गुणों में परिवर्तित करना




(C) उत्तरदायित्वपूर्ण स्वतन्त्रता का समावेश करना




(D) आदेश एवं आज्ञाकारिता जैसे मूल्यों का कक्षा में समावेश करना 13. आधुनिक शिक्षा दर्शन के अनुरूप विद्यालय




होने चाहिए




(A) वर्तमान सामाजिक संस्थाओं




प्रतिरूप




के




(B) सामाजिक विरासत को अग्रिम पीढ़ी तक पहुँचाने वाले 



14.




एक विद्यालयी पाठ्यक्रम को सर्वोत्तम तीरके से परिभाषित किया जा सकता है -







(B) शिक्षण के लिए प्रयुक्त समस्त सामाग्री एवं विधियाँ (C) विद्यालय द्वारा संगठित छात्र अनुभव





ज्ञानार्जन




15. पाठ्यक्रम का वह भाग जो छोटे बालकों की आवश्यकताओं की पूर्ति के उद्देश्य से निर्मित किया जाता है, उसे कहते हैं— (A) अध्ययन कार्यक्रम




(B) सामान्य शिक्षा




(C) वैकल्पिक विषय




(D) विशिष्ट शिक्षा 16. प्राय: 'सामान्य-शिक्षा के पाठ्यक्रम के सन्दर्भ में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किया जाता है




(A) छात्र के लिए जो भी आवश्यक ज्ञान है उसे उचित रूप में प्रदान किया जाए




(B) छात्र को उसके द्वारा चयनित कार्य क्षेत्र के लिए तैयार किया जाए (C) छात्र को नागरिकता एवं सामाजिक




कुशलताओं का प्रशिक्षण प्रदान किया जाए (D) छात्र को भारतीय सांस्कृतिक धरोहर की




ओर उन्मुख किया जाए 17.



(A) सोशल साइंसेज (Social Sciences) का पर्यायवाची




(B) एक ऐसा विषय जिसका सम्बन्ध मानव एवं उसके पारस्परिक सम्बन्धों से है

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